World Wide Web

What is World Wide web? | वर्ल्ड वाइड वेब क्या है? और क्या है इसका इतिहास ?

करीब 50 वर्षों से लोग एक ऐसे डाटाबेस का सपना देख रहे थे जो कि यूनीवर्सल ज्ञान एवं सूचनाओं (Information) को रखता हो तथा जिसके माध्यम से विश्व के लोगों को आपस में जोड़ा जा सके। विश्व का प्रत्येक व्यक्ति ऐसी जानकारी हासिल कर सके जो उसके लिये महत्वपूर्ण हो। यह सपना अब पूरा हो चुका है, इस तकनीक की खोज की जा चुकी है। इस तकनीक का नाम है World Wide Web (WWW).

www. Introduction (सामान्य परिचय):

वर्ल्ड वाइड वेब (World Wide Web) एक प्रकार का डाटाबेस है जो पूरे विश्व में फैला हुआ है। कोई भी यूजर इस के माध्यम से सूचनाओं को प्राप्त करता है। इसमें यूजर के द्वारा सूचना से सम्बन्धित शीर्षक दिया जाता है, इस शीर्षक से सम्बन्धित सभी सूचनाओं का वह उपयोग कर सकता है। पहले www में सिर्फ लिखित सूचनाएँ ही उपलब्ध थीं किन्तु अब चित्र(Picture), ध्वनि(Sound), कार्टून या कोई भी ऐसी सामग्री, जिसकी आप कल्पना कर सकते हैं, इसमें भी उपलब्ध हो जाती है।
वर्ल्ड वाइड वेब का अधिकांश प्रयोग इंटरनेट पर होता है, वर्ल्ड वाइड वेब (World Wide Web) इंटरनेट का एक भाग भी है। वर्ल्ड वाइड वेब को हम सूचनाओं की संरचना के रूप में भी परिभाषित कर सकते हैं। यह सारे ज्ञान को संक्षिप्त रूप में दर्शाता है।

वर्ल्ड वाइड वेब (World Wide Web) लचीला, आसानी से परिचालित करने योग्य तथा यूजर फ्रेन्डली (Friendly) गुण (Features) का मिला जुला रूप है। यह सेवायें इंटरनेट के माध्यम से प्रदान की जाती हैं। वर्ल्ड वाइड वेब और इंटरनेट, दोनों एक समान नहीं हैं परन्तु वे एक दूसरे से सम्बन्धित तथा एक दूसरे पर आश्रित हैं। वास्तव में वर्ल्ड वाइड वेब इंटरनेट का सुपरसेट है, जिसको हम इंटरनेट का ग्राफिकल-इंटरफेस (Graphical Interface) कह सकते हैं। यह हमको सूचनाओं को ऐक्सेस करने के नये नये तरीकों के बारे में जानकारी प्रदान करता है जिसके द्वारा लोग आपस में एक दूसरे से जुड़ सकते हैं।

वर्ल्ड वाइड वेब (World Wide Web)एक सिस्टम है जो संगठन तथा सम्बन्ध स्थापित करने के लिये प्रयोग में लाया जाता है। इसके माध्यम से इंटरनेट फाइल्स, स्रोत तथा सुविधाओं का उपयोग किया जा सकता है। वेब एक इंटरनेट आधारित संचालन सिस्टम है जो सूचना वितरण एवं प्रबन्धन के लिये परम आवश्यक है। वेब इंटरनेट पर यह सुविधा प्रदान करता है जिसमें Clients अपनी सूचनाओं का आदान-प्रदान कर सकें। वेब’ तकनीकी अन्य इंटरनेट सुविधाओं से भिन्न है। यह एक इंटरनेट स्रोत है जहाँ कोई किसी दूसरे विषय पर सूचनाओं तथा सूचनाओं से सम्बन्धित ज्ञान प्राप्त करता है।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि वेब पर सारी सूचनाएँ एक अच्छे तरीके से प्रदर्शित होती हैं। वेब अपने यूजरों को कम्प्यूटर नेटवर्क के माध्यम से मीडिया को ऐक्सेस करने के तरीके हैं । वेब एक प्रकार का इंटरफेस है जिसके माध्यम से यूजर कठिन से कठिन स्रोतों (Source) व सूचनाओं (Information) का आसानी से प्रयोग कर सकता हैं। इसको हम www, w3 और साधारण वेब के नाम से भी जानते हैं। वेब एक पेज होता है जिसमें सारी सूचनायें स्पष्ट रूप से एक दूसरे से जुड़ी रहती हैं।

वर्ल्ड वाइड वेब का इतिहास – History of the World Wide Web (www):

वर्ल्ड वाइड वेब से पहले इंटरनेट को संचालित करना, सूचनाओं को प्राप्त एवं उनका उपयोग करना अत्यन्त कठिन था। फाइलों को लोकेट (Locate) तथा डाउनलोड (Download) करने के लिये कुछ UNIX SKILLS का सहारा लेना पड़ता था जो कि www के बाद आसान हो गया।

टिम बर्नर ली (Tim Berners Lee) को हम वर्ल्ड वाइड वेब के पिता के रूप में पहचानते हैं। बर्नर, स्विटजरलैण्ड में स्थित, European organization Nuclear Research नामक प्रयोगशाला में भौतिकशास्त्री थे। टिम, इंटरनेट के संचालन तथा उसके प्रयोग में आने वाली कठिनाइयों के कारण निराश हो चुके थे। टिम ने European organization for Nuclear Research (CERN) में अपनी खोज, साझेदारी तथा अपने साथियों के साथ कम्यूनिकेशन के माध्यम से इंटरनेट पर लगातार कार्य किया। टिम पहले से ही समस्या को जानते थे इसलिये उन्होंने कार्य को आसान करने के लिये एवं इंटरनेट को आसानी से संचालित करने के लिये एक सिस्टम का निर्माण किया। सन् 1989, में उन्होंने www सिस्टम के प्रस्ताव को European organization for Nuclear Research के इलेक्ट्रोनिक्स एवं कम्प्यूटिंग विभाग के समक्ष प्रस्तुत किया तथा इस प्रस्ताव पर फीड बैक (Feed Back) प्राप्त करने के बाद अपने सहयोगी राबर्ट कैलियो (Rabert Cailliao) के साथ Rewised कर इस प्रस्ताव को दोबारा प्रस्तुत किया। यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया एवं व्यापारिक रूप से यह प्रोजेक्ट शुरू हो गया।

प्रोजेक्ट के विकास के लिये वित्त प्रदान किया गया एवं सन् 1991 में इसकी Hint जनता के लिये प्रदान की गयी ताकि जनता इंटरनेट पर नये विकास को समझ सके।
फरवरी, 1993 में नेशनल सेन्टर फॉर सुपर कम्प्यूटिंग एप्लीकेशन द्वारा www का पहला संस्करण मोजेक (Mosaic) (Type of web browser) जनता के लिये प्रदान किया गया। यह एक आधारभूत सॉफ्टवेयर उत्पाद था जिसने www को नयी उँचाई प्रदान की। यह एक यूजर फ्रेंडली ग्राफिकल यूजर इंटरफेस (GUI) प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त मोजेक माउस (Mouse) के प्रयोग की अनुमति देता है, अर्थात् कोई यूजर बिना Keyboard के भी इसका प्रयोग कर सकता है।
अंत में एक साल बाद April 1994 में National Science Foundation (NSF) ने यह महसूस किया कि web ने सफलता की नई ऊँचाई प्राप्त कर ली है तथा लोगों ने वर्ल्ड वाइड वेब का उपयोग युद्ध स्तर पर शुरू कर दिया है।

होम पेज ( Home Page) –

कोई भी संगठन, संस्था, कम्पनी या व्यक्ति इस सुविधा का उपयोग कर सकता है। इसमें अपने बारे में एवं अपने उत्पाद से सम्बन्धित दी जाने वाली सुविधाओं तथा अपनी शाखाओं में सम्बन्धित जानकारी दी जा सकती है, यह प्रचार का सबसे सस्ता व आसान उपाय है।

होम पेज पर लिखित सामग्री के अलावा ग्राफ, तस्वीरें, कार्टून, यहाँ तक कि ध्वनि भी उपलब्ध की जा सकती है। आजकल तो होमपेज पर मल्टीमीडिया (गाने, पिक्चर) आदि की सेवा भी उपलब्ध है। होम पेजों को एक साथ एक श्रेणी में रखा जा सकता है.
इंटरनेट से जुड़े अनेक कम्प्यूटरों में सूचनाओं का भंडार है। नेट पर ये सूचनायें आसानी से उपलब्ध हैं। इसमें विश्वकोष, पुरानी और नई लोकप्रिय किताबें, विशेष लेख, अखबारी कतरन, दुनियाभर के विभिन्न विश्वविद्यालयों के शोधपत्र आदि शामिल हैं। पूरी पत्रिकायें व अखबार भी इस पर उपलब्ध हैं। सूचनाओं का यह इतना बड़ा भंडार है कि उपयोग करने वाले को यह पता नहीं रहता है कि उससे सम्बन्धित सूचना कहाँ पर होगी ?

वेब पेज (Web Page) –

वेब पेज एक वर्ल्ड वाइड document से ज्यादा कुछ भी नहीं होता है, एक वेब Page एक वर्ड प्रोसेसिंग डॉक्यूमैन्ट (Word Processing document) होता है।

इस तरह हम कह सकते हैं कि Weg page, web पर उपलब्ध एक hypertext document होता है। या hypertext या hypermedia की वह यूनिट जो वर्ल्ड वाइड वेब पर उपलब्ध रहती है उसे Web Page कहते हैं। इसको बनाने के लिये हमें HTML (Hypertext Markup language) का इस्तेमाल करना पड़ता है।

पेज की संरचना (Structure of a Webpage)

एक वेब पेज दो भागों से मिलकर बना होता है

1 Head, 2. Body.

Head – यह किसी वेब पेज का पहला हिस्सा होता है, इसमें पेज का शीर्षक तथा अन्य Parameter उपलब्ध रहते हैं जिन्हें Browser द्वारा प्रयोग में लाया जाता है।
Body – किसी पेज के वास्तविक contents पेज के इस हिस्से में रहते हैं और वह content, Text व Tag को शामिल रखते हैं।

वेब साइट (Website)

वेब साइट साधारण रूप से वेब पेजों (Web pages), से मिलकर बनी होती है। अपने व्यवहार के अनुसार वेब एक दूसरे के मध्य link प्रदान करता है जो कि चाहे अलग-अलग पेजों में ही क्यों न हो। एक पेज दूसरे अलग पेजों से link बना सकता है चाहे उनमें फोटो, कार्टून या कोई अन्य सामग्री हो।

इस प्रकार, हम कह सकते हैं कि web site एक दूसरे से जुड़े हुए पेजों से मिलकर बना होता है। इसके कुछ उदाहरण निम्न हैं :

(1) http://www.google.com
(2) http://www.youtube.com
(3) http://www.msn.com
(4) http://www.hotmail.com

Working of the web (वेब कैसे काम करता है)?

वेब सॉफ्टवेयर, Client-server संरचना को ध्यान में रखकर बनाया जाता है। वेब क्लाइंट एक प्रोग्राम है जो documents के लिये किसी सर्वर पर अपनी request भेजता है।

वेब सर्वर भी एक प्रोग्राम है जो request 1 को प्राप्त करके मांगे गये document का विवरण client को वापस भेजता है। वितरित संरचना (Distributed structure) का अर्थ यह है कि कोई भी क्लाइंट प्रोग्राम किसी भी सर्वर से जुड़े अन्य कम्प्यूटर पर क्रियान्वित हो सकता है, संभवतः दूसरे कमरे या दूसरे देश में। सारे प्रोग्राम अपने-अपने कार्यों पर ध्यान केन्द्रित करते हैं तथा स्वतन्त्र रूप से कार्यों को आगे बढ़ाते हैं क्योंकि सर्वर सिर्फ उस समय कार्य करता है जब कोई क्लाइंट किसी डाक्यूमेंट की मांग करता है।

वेब प्रक्रिया का कार्य निम्नलिखित है-

(1) किसी प्रोग्राम पर कार्य करते समय यूजर किसी hyperlink के माध्यम से किसी दूसरे डॉक्यूमेंट से जुड़ सकता है।

(2) वेब क्लाइंट किसी hyperlink के माध्यम से किसी Address का उपयोग करता है जो हमें किसी निश्चित नेटवर्क पर स्थित वेब सर्वर से जोड़ता है तथा हमें History of computer document के बारे में बताता है।

3) सर्वर अपनी प्रतिक्रिया किसी Text को भेजकर तथा उस टेक्स्ट में पिक्चर, साउन्ड या मूवी को क्लाइंट तक भेजकर व्यक्त करता है और वह क्लाइंट उसको यूजर स्क्रीन पर भेजकर व्यक्त करता है।

वर्ल्ड वाइड वेब
World wide web
www
knowledge4utech.com

वेब इस तरह के हजारों लेन-देनों को प्रति घंटा सारे विश्व में क्रियान्वित करता है।

वेब ब्राउजर (Web Browser)

यह एक ऐसा प्रोग्राम है जिसका प्रयोग इंटरनेट पर उपलब्ध सारी सुविधाओं तथा स्रोतों को वर्ल्ड वाइड वेब के माध्यम से ऐक्सेस करने में किया जाता है। वेब ब्राउजर, एक वर्ल्ड वाइड वेब क्लाइंट एप्लीकेशन है जिसका उपयोग hypertext documents तथा वेब पर उपलब्ध अन्य HTML प्रलेखों को Link के माध्यम से प्राप्त करने में किया जाता है। इस तरह हम कह सकते हैं कि वेब ब्राउजर एक ऐसा प्रोग्राम है जिसके माध्यम से हम www.website से contact करते हैं।

वर्ल्ड वाइड वेब यह मांग नहीं करता है कि अपना एक जैसा ही वेब ब्राउजर उपयोग में लायें। कुछ प्रचलित वेब ब्राउज़र निम्नलिखित हैं :

(1) Mosaic (2) क्रोम (Chrome)

(3) Opera (4) Internet Explorer.

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INTERNET VS INTRANET

Internet VS Intranet | इन्टरनेट व इन्ट्रानेट में अन्तर

ज़्यादातर लोग Internet VS Intranet मे भ्रमित रहते है, उन्हे नहीं मालूम होता की इन दोनों मे क्या अंतर है? कहाँ कहाँ पर इंका उपयोग होता है। सामान्यतः इंटरनेट का प्रयोग सभी जगहों पर होता है । सभी User इसका उपयोग घरों मे, ऑफिस मे या मोबाइल और कम्प्युटर पर आसानी से कर सकते हैं, जबकि इन्टरानेट का उपयोग निजी तोर पर ही किया जा सकता है।

Internet VS Intranet -जैसा कि हम जानते हैं कि इन्टरनेट एक नेटवर्कस का नेटवर्क है, जो कि सम्पूर्ण विश्व को आपस में जोड़ता है।
इसी प्रकार इन्ट्रानेट (Intranet) किसी कंपनी का आंतरिक नेटवर्क है जो कि इंटरनेट मापका (Standards) का उपयोग करता है।
इन्ट्रानेट, इन्टरनेट सॉफ्टवेयर व इन्टरनेट प्रोटोकॉल का प्रयोग करता है परन्तु यह हमेशा इन्टरनेट से स्थाई कनेक्शन नहीं रखता है।

इन्टरनेट व इन्ट्रानेट में अन्तर (Difference between Internet & Intranet)

Internet VS Intranet
  • इन्ट्रानेट के माध्यम से किसी लोकल एरिया नेटवर्क (LAN) को जोड़ा जा सकता है। जबकि इन्टरनेट लोकल एरिया नेटवर्क व वाइड एरिया नेटवर्क (WAN) दोनों को स्थापित कर सकता है।
  • इन्ट्रानेट, इन्टरनेट मापकों का प्रयोग करता है, परन्तु किसी एक निश्चित जगह या संगठन में जबकि इंटरनेट इन मापकों (प्रोटोकॉल, टूल आदि) का प्रयोग विश्वव्यापी रूप में करता है।
  • इंट्रानेट mail server व सूचनाओं का प्रयोग निजी न्यूजग्रुप बनाने में करता है, जबकि इंटरनेट Mail server व सूचनाओं का प्रयोग सार्वजनिक न्यूजग्रुप बनाने में करता है।
  • हम किसी इंटरनेट साइट को बिना इंट्रानेट साइट के बना सकते हैं, जबकि इंट्रानेट साइट को बिना इंटरनेट साइट की सहायता के नहीं बनाया जा सकता। परन्तु हम इंट्रानेट साइट को इंट्रानेट की सहायता के बिना लागू कर सकते हैं।
  • इंटरनेट का प्रयोग करने वालों की संख्या इंट्रानेट प्रयोग करने वालों से बहुत अधिक होती है। अत: इंटरनेट से जुड़ा हार्डवेयर, इंट्रानेट के साथ जुड़े हार्डवेयर की तुलना में बहुत अधिक क्षमता वाला होता है। इसका अर्थ यह है कि इंटरनेट के माध्यम से हम सूचनाओं, विचारों का आदान-प्रदान विश्व में कहीं भी कर सकते हैं, पर इंट्रानेट के माध्यम से यह आदान-प्रदान कुछ सीमित क्षेत्र तक ही होता है।

संक्षिप्त रूप में हम यह कह सकते हैं कि इंट्रानेट इंटरनेट से भिन्न नहीं है, पर दोनों में केन्द्रण का अन्तर’ होता है अर्थात् इंटरनेट किसी कंपनी के अन्दर व बाहर दोनों पर केन्द्रित. होता है, जबकि इन्ट्रानेट किसी कंपनी या क्षेत्र के भीतर।

इंटरनेट और इंट्रानेट की कुछ समानताएं – Similarities Internet and Intranet


इंटरनेट और इंट्रानेट दोनों एक नेटवर्क ही हैं. इसलिए जाहिर हैं इंटरनेट एवं इंट्रानेट की कार्यप्रणाली में भी समानताएं होगी।

  • इंटरनेट और इंट्रानेट दोनों में समान तकनीक Internet Technology का इस्तेमाल होता हैं।
  • दोनों को वेब ब्राउजर द्वारा Access किया जा सकता हैं।
  • इंटरनेट और इंट्रानेट दोनों किसी नेटवर्क को Represent करते हैं।

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Database

डाटाबेस क्या है? तथा उनकी विशेषताएँ | What is Database Explain its Features in Hindi?

प्रश्न-1 डाटाबेस क्या है? कुछ डाटाबेस मैनेजमेन्ट सिस्टम के नाम लिखिए तथा उनकी विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। What is a database? Write the name of some database management systems and mention their features.

What is Database? डाटाबेस क्या है?

Database- परस्पर सम्बन्धित डाटा और इस डाटा को प्रयुक्त करने वाले प्रोग्राम्स का समुच्चय डाटाबेस मैनेजमेन्ट सिस्टम (DBMS) कहलाता है। डाटा के संकलन को डाटाबेस (Database) कहते हैं। डाटाबेस में किसी संस्था या प्रणाली की सम्पूर्ण सूचना संग्रहित (Store) रहती है। डाटाबेस को निश्चित उद्देश्य की पूर्ति के लिए तैयार किया जाता है। डाटाबेस तैयार करते समय इसके एप्लिकेशन और एण्ड यूजर (End User) की आवश्यकताओं को ध्यान में रखा जाता है। डाटाबेस को एक सॉफ्टवेयर पैकेज ‘डाटाबेस मैनेजमेन्ट सिस्टम (DBMS)’ की सहायता से मैनेज किया जाता है।

डाटाबेस सूचना के संग्रहणऔर प्राप्ति को प्रभावशाली (Efficient) और सुगम (Convenient) बनाना ही DBMS का प्रमुख उद्देश्य होता है।

DBMS एक सॉफ्टवेयर है जिसकी सहायता से यूजर डाटाबेस को रिकॉर्ड और मेन्टेन करते हैं। यह एक ऐसा एनवायरनमेन्ट (Environment) प्रदान करता है जिसमें डाटा को सरलता और प्रभावशाली रूप से स्टोर और रिट्रीव (प्राप्त) किया जा सकता है। वृहद सूचना संकलन का प्रबन्धन करने के लिए डाटाबेस सिस्टम तैयार किया जाता है।

What is Database?
What is Database?

डाटा के इस प्रबन्धन में निम्नलिखित का समावेश रहता है

(i) सूचना संग्रहण के स्ट्रक्चर की परिभाषा (Definition),

(ii) सूचना को सुव्यवस्थित (Manipulation) करने की कार्यविधि का प्रावधान,

(iii) सिस्टम क्रैश और अवैध घुसपैठ से सूचना की सुरक्षा प्र प्रणाली आदि।

DBMS सॉफ्टवेयर के नाम (Name of Some DBMS Software’s)

निम्नलिखित डाटाबेस मैनेजमेन्ट सिस्टम सॉफ्टवेयर मार्केट में पाये जाते हैं

(i) माई एस.क्यू.एल. (My SQL)

(ii) माइक्रोसॉफ्ट एक्सैस (Microsoft. Access),

(iii) फॉक्स-प्रो (FoxPro)

(v) डी.बी. 2 (DB 2)

(vi) सीबेस (Sybase)

(iv) ओरेकल (Oracle)

माई एस.क्यू.एल. की विशेषताएँ (Features of My SQL) –

निम्न सूची My SQL डाटाबेस सॉफ्टवेयर की महत्वपूर्ण विशेषताओं का वर्णन करता है

(i) इन्टर्नल और पोर्टेबिलिटी (Internal or Portability)

  • सी और सी++ में लिखा गया।
  • विभिन्न कम्पाइलर्स के साथ परीक्षण किया गया।
  • कई अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर काम करता है।
  • पोर्टेबिलिटी के लिए GNU Automatic, Autocut और Live tool का उपयोग।

(ii) स्तंभ प्रकार (Column Type)

  • कई कॉलम (Column) टाइप का उपयोग (जैसे साइन्ड और अन्साइन्ड इन्टीजर्स)
  • फिक्स्ड लम्बाई और वैरिएबल (Variable) लम्बाई रिकॉर्ड।

(iii) स्टेटमेन्ट और फंक्शन (Statement and Function)

  • पूर्ण ऑपरेटर और फंक्शन का चयन (Select) तथा कहाँ (Where) खण्ड (Clause) में समर्थन।
  • टेबल और कॉलम के उपनाम (Aliases) का समर्थन।

(iv) सिक्योरिटी (Security)

(v) स्कैलेबिलिटि और सीमाएँ (Scalability and Limit)

(vi) Connectivity

(vii) क्लाइन्ट्स और टूल्स (Clients and Tools)

माइक्रोसॉफ्ट एक्सैस की विशेषताएँ (Features of Microsoft Access) –

(i) डाटाबेस (Database) –

डाटाबेस एक फाइल है जिसमें डाटा तथा उससे सम्बन्धित ऑब्जैक्ट को स्टोर किया जाता है।

(ii) टेबल (Table) –

प्रत्येक टेबल कस्टमर से सम्बन्धित सूचना को स्टोर करती है।

(iii) क्वैरी (Query)-

क्वैरी टेबल स्टोर डाटा के विभिन्न स्वरूपों के देखने के काम आती है।

(iv) रिपोर्ट (Report) –

क्वैरी द्वारा चयनित डाटा के प्रिन्ट होने से पहले रिपोर्ट के द्वारा देखा जाता है।

(v) डाटा एक्सैस पेज (Data Access Page) –

यह एक ऑब्जैक्ट है।

(vi) मैक्रो (Macro) –

मैक्रो किसी घटना के लिए एक या एक से अधिक कार्यों का समूह है।

(vii) मॉडयूल (Module) –

यह कस्टम प्रक्रियाओं (Custom Procedures) से बना एक ऑब्जैक्ट है।

फॉक्स-प्रो की विशेषताएँ (Features of Foxpro) –

  • लोकल डाटाबेस (Local Database)
  • लेन डाटाबेस (LAN Database)
  • SQL डाटाबेस सर्वर (SQL Database Server)

(i) टाईप (Type)

  • Window
  • DOS

(ii) टेबल व्यू (Table/View)

  • लोकल (Local)
  • रिमोट (Remote)

ओरेकल की विशेषताएँ (Features of Oracle) –

(i) स्कैलेबिलिटि और परफॉर्मेंस (Scalability and Performance)

  • कॉनकरैन्सी (Concurrency)
  • रीयल कनसिसटेन्सी (Real Consistency)
  • पोर्टेबिलिटि (Portability)

(ii) मैनेजेबिलिटि (Manageability)

  • सेल्फ मैनेजिंग डाटाबेस (Self Managing Database)
  • SQL Plus
  • ASM
  • रिसोर्स मैनेजर (Resource Manager)
  • शैड्यूलर (Scheduler)

(iii) बैकअप और रिकवरी (Backup and Recovery)

(iv) हाई एवेलेबिलिटि (High Availability)

(v) बिजनेस इन्टैलीजेन्स (Business Intelligence)

(vi) सिक्योरिटी (Security)

(vii) डाटा इंटेग्रिती (Data Integrity)

DB2 की विशेषताएँ (Features of DB2)

(i) इनोवेटिव मैनेजेबिलिटी (Innovative Manageability)

  • कॉन्फिग्युरैशन एडवाइजर (Configuration Advisor)
  • हैल्थ सेन्टर (Health Center)
  • मैमोरी विजुअलाइजर (Memory Visualizer)

(ii) इनफॉर्मेशन इन्टीग्रेशन फाउन्डेशन (Information Integration Foundation)

  • कन्ज्यूमर को सपोर्ट करता है व वेन सर्विस प्रोवाइड करता है।
  • स्टोर कम्पोज, वैलिडेट, XML data

(ii) ई-बिजनेस फाउन्डेशन (E-Business Foundation)

  • कनैक्शन कॉन्सेन्ट्रेटर फॉर यूजर स्कैलेबिलिटी (Connection Concentrator for User Scalability)
  • डायनामिक कॉन्फिग्युरैशन (Dynamic Configuration)
  • ऑनलाइन लोड (Online Load)
  • न्यू क्लाइन्ट आर्किटेक्चर (New Client Architecture)

(iv) यूजर मेन्टेन्ड् सारांश या समरी टेबल (User Maintained Summary Table)

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कम्प्यूटर नेटवर्क

कंप्यूटर नेटवर्क -Computer Network

What is Computer Networking?

कम्प्यूटर नेटवर्क आपस में जुड़े स्वतंत्र कम्प्यूटरों (Autonomous Computers) का समूह है जो आपस में डाटा और सूचनां का आदान-प्रदान करने में सक्षम हैं। नेटवर्क का उदेश्य सूचना, संसाधनों तथा कार्यो की साझेदारी करना होता है। इसमें किसी एक Computer Network पर नियंत्रण नहीं होता।
किसी Computer Network में संचार को स्थापित करने के लिए चार चीजों को आवश्यकता पड़ती है।
1. प्रेषक
2. माध्यम
3. प्राप्तकर्ता
4. भेजने और प्राप्त करने की कार्य विधि –

प्रोटोकॉल –

किसी नेटवर्क में विभिन्न कम्प्यूटरों को आपस में जोड़ने तथा सूचना के आदान-प्रदान को सरल बनाने के लिए बनाए गए नियमों और प्रक्रियाओं (Rules and procedures) का समूह प्रोटोकॉल कहलाता है।

नोड –

नेटवर्क से जुड़े विभिन्न कम्प्यूटरों का अंतिम बिंदु या टर्मिनल जो नेटवर्क के संसाधनों का उपयोग कर सकते हैं, नोड कहलाता है।

सर्वर –

नेटवर्क के किसी एक नोड को संचार व्यवस्था बनाए रखने तथा साझा संसाधनों के उपयोग में नियंत्रित करने की जिम्मेदारी सौंपी जाती है, जिसे सर्वर कहते हैं। यह नेटवर्क से जुड़े प्रत्येक कम्प्यूटर को विभिन्न सेवाएं प्रदान करता है।

संचार की विधियां-

1. सिम्पलेक्ट विधि –

डाटा व सूचनां का एक ही दिषा में संचारण होता है। इसमें सूचना प्राप्त होना सुनिष्चित नहीं होता है। जैसे – रेडियो का प्रसारण।

2. अर्ध-डुप्लेक्स विधि –

इसमें सूचनाओं का संचारण दोनों दिशाओं में किया जा सकता है, पर एक बार में एक ही दिशा में सूचनाएं जा सकती हैं। जैसे टेलीफोन पर आवाज का आदान प्रदान। इसके लिए दो तार की आवशयकता पड़ती है

3. पूर्ण डुप्लेक्स विधि –

सूचना तथा डाटा को दोनों दिशाओं में एक साथ प्रेषित किया जा सकता है। इसमें चार तार की जरूरत पड़ती है।

बैंडविड्थ –

डाटा के संचारण के समय माध्यम में उपलब्ध उच्चतम और निम्नतम आवृति (Higher and lower frequency) की सीमा बैंडविड्थ कहलाती है। बैंडविड्थ जितना अधिक होगा, डाटा का संचारण उतना ही तीव्र होगा।

ब्रॉडबैण्ड –

इस सेवा का उपयोग तीव्र गति से अधिक डाटा के संचारण के लिए किया जाता है। इसमें डाटा स्थानान्तरण की गति एक मिलियन (दस लाख) बॉड या इससे अधिक हो सकती है। वर्तमान में इंटरनेट के लिए बा्रॅडबैण्ड सेवा का प्रयोग किया जा रहा है।

संचार के माध्यम –

डाटा और सूचनाओं के संचारण के लिए कुछ महत्वपूर्ण माध्यम हैं –
1. युग्मतार
2. को-एक्सियल केबल
3. प्रकाषीय तंतु
4. माइक्रोवेब
5. संचार उपग्रह

युग्मतार –

इसमें तांबे के दो तार होते हैं, जिन पर कुचालकों की परत चढ़ी रहती है। ये तार आपस में लिपे रहते हैं और संतुलित माध्यम बनाते हैं जिससे केबल में शोर (Noise ) में कमी आती है।

को-एक्सियल केबल –

युग्मतार - Computer Network

इसमें केंन्द्रीय ठोस चालक के चारों ओर चालक तार की जाली जिसे शील्ड भी कहते हैं, रहती है तथा दोनों के बीच प्लास्कि का कुचालक रहता है। तार की जाली भी कुचालक से ढकी रहती है। संकेतों का संचरण केन्द्री ठोस तार से होता है जबकि शील्ड शीर्ड अर्थ (Earth) से जुड़ा रहता है। इसका उपयोग केबल टीवी नेटवर्क में भी किया जाता है।

प्रकाशीय तंतु –

प्रकाशीय तंतु - Computer Network

इसमें ग्लास या प्लास्कि या सिलिका (Silica) का बना अत्यंत पतला तंतु होता है जो एलइडी (LED ) या लेजर डायोड द्वारा उत्पन्न संकेत युक्त प्रकाश को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाता है। प्रकाश को पुनः संकेतों में बदलने के लिए फोटो डायोड का इस्तेमाल किया जाता है। यह रेडियों आवृत्ति अवरोधों से मुक्त होता है।
इसमें शोर अत्यंत कम, बैंडविड्थ अधिक, गति तीव्र तथा संकेतों की हानि निम्नतम होती है। ये लंबी दूरी के संचार के लिए उपयुक्त हैं। पर इसको लगाने और रख-रखाव का खर्च अधिक होता है।

डाटा प्रेषण सेवा –

भारत मे प्रमुख डाटा प्रेषण सेवा प्रदाता जिन्हें, (Common Carriers) भी कहते हैं, हैं –
1. (VSNL) विदेष संचार निगम लिमिटेड
2. (BSNL) भारत संचार निगम लिमिटेड
3. (MTNL) महानगर टेलीफोन निगम लिमिटेड

इनके द्वारा प्रदत्त मुख्य सेवाएं हैं –

1. डायल अप लाइन –

इसे स्विच्ड लाइन भी कहते हैं तथा इसका उपयोग टेलीफोन की तरह नम्बर डायल कर संचार स्थापित करने में किया जाता है।

2. लीज्ड लाइन –

इसे व्यक्तिगत या सीधी लाइन भी कहते हैं। इसमें को दूरस्थ कम्प्यूटरों को एक खास लाइन से सीधे जोड़ा जाता है। इसका प्रयोग आवाज और डाटा दोनों के लिए किया जा सकता हैं।

3. आई एस डी एन (ISDN)(Integrated Services Digital Network)

यह डिजिटल टेलीफोन व डाटा हस्तांतरण सेवा प्रदान करता है। चूंकि डाटा हस्तांतरण डिजिटल रूप में होता है इसलिए इसमें मॉडेम की जरूरत नहीं रहती तथा शोर भी निम्न होता है।

कम्प्यूटर नेटवर्क (Computer Network) का वर्गीकरण

1. लोकल एरिया नेटवर्क (LAN )-

एक निष्चित और छोटे भौगोलिक क्षेत्र (लगभग 1 किमी) में आपस में जुड़े कम्प्यूटर का जाल लोकल एरिया नेटवर्क कहलाता है। यह किसी एक ऑफिस, फैक्टरी या विश्वविद्यालय कैम्पस में कुछ किमी. क्षेत्र तक ही फैला रहता है। इथरनेट एक लोकप्रिय लैन है। लैन में कम्प्यूटरों को जोडने के लिए बस टोपोलॉजी तथा को -एक्सिंगल केबल का प्रयोग किया जाता है। इसमें रख-रखाव आसान होता है।

2. मेट्रोपोलिटन एरिया नेटवर्क (MAN )- यह किसी बड़े भौगोलिक क्षेत्र लगभग 100 किमी. त्रिज्या में स्थित कम्प्यूटरों का नेटवर्क है। इसका उपयोग एक ही शहर में स्थित निजी या सार्वजनिक कम्प्यूटर को जोड़ने में किया जाता है।

3. वाइड एरिया नेटवर्क (WAN ) –

यह एक विस्तृत भौगोलिक क्षेत्र, कई देश महाद्वीप या संपूर्ण विष्व में फैले कम्प्यूटरों का नेटवर्क है। इसमें कम्प्यूरों को टेलीफोन, प्रकाशीय तंतु या कृत्रिम संचार उपग्रह से जोडा जाता है। इसमें गति कम रहती है तथा त्रुटियों की संभावना अधिक रहती है। इसे लॉग हॉल नेटवर्क भी कहा जाता है।

नेटवर्क टोपोलॉजी

नेटवर्क टोपोलॉजी नेटवर्क के विभिन्न नोड या टर्मिनल्स को आपस में जोड़ने का तरीका है। यह नेटवर्क की भौतिक संरचना को बताता है।
मुख्य नेटवर्क टोपोलॉजी हैं –
1. स्टार
2. बस
3. रिंग
4. ट्री

स्टार टोपोलॉजी-

Computer Network

इसमें किसी एक नोड को होस्ट नोड या केन्द्रीय हब (Host node or central hub) का दर्जा दिया जाता है। अन्य कम्प्यूटर या नोड आपस में केन्द्रीय हब द्वारा ही जुड़े रहते हैं। इसमें विभिन्न नोड या टर्मिनल आपस में सीधा संपर्क न करके होस्ट कम्प्यूटर द्वारा संपर्क स्थापित करते हैं।

बस टोपोलॉजी-

computer network

इसमें एक केबल, जिसे ट्रांसमिशन लाइन कहा जाता है, के जरिये सार नोड जुडे रहते हैं। किसी एक स्ेषन द्वारा संचारित डा सभी नोड्स द्वारा ग्रहण किये जा सकते हैं। इस कारण इसे ब्रॉडकास्ट नेटवर्क भी कहते हैं। लैन में मुख्यतः यही टोपोलॉजी प्रयोग की जाती है।

लाभ –

इसमें कम केबल की आवष्यकता पड़ती है। अतः इसमें खर्च कम पड़ता है। इसमें एक बार में केवल एक ही नोड डाटा संचारित कर सकता है। प्रत्येक नोड को विशेष हार्डवेयर की आवश्यकता पड़ती है।

रिंग टोपोलॉजी –

सभी नोड एक दूसरे से रिंग या लूप (Ring or loop) में जुडे़ होते हैं। बस टोपोलॉजी के दो अंत बिन्दुओं को जोड़ देने से रिंग टोपोलॉजी का निर्माण होता है। प्रत्येग नोड अपने निकटतम नोड से डाटा प्राप्त करता है। अगर वह डाटा उसके लिए है तो वह उसका उपयोग करता है, अन्यथा उसे अगले नोड को भेज देता है।

लाभ –

केन्द्रीय कम्प्यूटर की आवश्यकता नहीं पड़ती। दो कम्प्यूरों के बीच केबल मे त्रुटि से दूसरे मार्ग द्वारा संचार संभव हो पाता है।

हानि –

किसी एक स्थान पर रिपीटर में त्रुटि होने पर पूरा नेटवर्क प्रभावित होता है।
बेतार तकनीक –
केबल के खर्चीला होने तथा रख-रखाव की समस्या के कारण विभिन्न कम्प्यूटर को नेटवर्क से जोड़ने के लिए बेतार तकनीकी का प्रयोग किया जा रहा है।

वाई-मैक्स –

यह लंबी दूरी के लिए बेतार की सहायता से डाटा का संचरण संभव बनाता है। इसकी विशेसता संचार माध्यम का विशाल बैंड (ब्राडबैंड) है। वाई मैक्स 3.3 से 3.4 GHz के बीच कार्य करता है।

वायरलेस लोकल लूप –

यह स्थानीय बेतार तकनीक है जिसमें बड़ा बैंडविड्थ तथा उच्चगति के डाटा संचरण के साथ टेलीफोन की सुविधा भी प्रदान की जाती है। यह नेवर्क के लिए एक लोप्रिय साधन होता जा रहा है।

Google Chrome Extensions

Useful Google Chrome Extensions in Hindi (आपके कम्प्युटर मे होने ही चाहिए)

आपको (गूगल क्रोम एक्सटेंशन) Google Chrome extensions के वारे मे बताने वाला हूँ। जो की आपके Computer पर होने ही होने चाहिए, क्योकि ये extensions आपके काम को बहुत ज्यादा आसान बना देंगे। इन एक्सटैन्शन का use मे भी करता हूँ।

Dark Reader Chrome Extension:

अगर आप कई घंटों तक अपने कम्प्युटर या लैपटाप पर बैठकर इंटरनेट access करते हैं तब Darak Reader Extension आपके web Browser पर होना ही चाहिए। क्योकि इसके जरिये ही आप किसी भी वैबसाइट को dark mode मे convert कर सकते हैं। और साथ ही किसी भी वैबसाइट की brightness और Contrast की setting को change कर सकते हैं। जिससे की आपके आँखों पर स्क्रीन का कम इफैक्ट होगा।

Dark Reader Extension को ब्राउज़र मे Add करने के बाद, इस एक्सटैन्शन को On करने के लिए अपने keyboard से Alt+Shift+D press करेंगे तो ये page Dark Mode मे Convert हो जाता है। और अगर आप फिर से इसे नॉर्मल mode मे बदलना है तो फिर से Alt+Shif+D key को Press कर दीजिये।

Dark Reader Chrome Extension

Save Image As Type:

इस Google Chrome Extension द्वारा किसी भी इमेज को इंटरनेट से अलग अलग Format मे download किया जा सकता है।

जैसे गूगल सर्च बार पर कोई इमेज खोलकर इसे Download करना चाहते हैं, तो इमेज पर राइट बटन क्लिक करके यहाँ पर क्लिक करेंगे। अब यहाँ से Format सिलैक्ट करेंगे JPG, PNG, Webp इत्यादि। किस तरह की इमेज आप download करना चाहेंगे।

Chrome Extension Save image as type

Chrome Extensions- Google Input Tools:

अगर आप इंग्लिश के अलावा किसी दूसरी भाषा मे कुछ टाइप करना चाहते हैं तब ये extension बहुत ही बेहतरीन एक्सटैन्शन है।

इस extension को इन्स्टाल करने के बाद आप इसकी Extension setting मे जाकर अपने पसंद की language को चुन सकते हैं। इसके बाद आप जो भी टाइप करेंगे तो वो उसी language मे टाइप होगा। जैसे हमने यहाँ पर हिन्दी लैड्ग्वेज को सिलैक्ट कर लिया है। तो इसके बाद आप जो भी ऑनलाइन टाइप करेंगे वो हिन्दी मे टाइप होगा।

Chrome Extensions- Grammarly extension:

इस गूगल क्रोम एक्सटेंशन Google Chrome Extensions के जरिये आप कुछ भी टाइप करते हुए अपनी grammatical Mistakes को correct कर सकते हैं।

ये extension उन लोगों के लिए है जो ऑनलाइन लिखने का काम ज्यादा करते हैं। जैसे वो अपने वेबसाइट के लिए कंटैंट लिखते है। या E-Mail टाइप करते हैं। वो लोग Grammarly mistakes को इस एक्सटैन्शन के जरिये correct कर सकते हैं।

Grammarly Install करने के बाद सबसे पहले आपको इसमे अपना अकाउंट क्रिएट करना होगा या फिर पहले से बने अकाउंट से लॉगिन करना होगा।

उसके बाद आप कुछ भी टाइप करेंगे तो उसको ये extension उसको Correct कर देगा या फिर उसका सही suggestion show कर देगा।

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Cyber Security in Hindi

Cyber Security in Hindi- साइबर सुरक्षा व बचाव

आजकल इंटरनेट का स्तेमाल करने वालों की तादात पूरी दुनियाँ मे काफी बड्ती जा रही है। यानि कम्प्युटर और मोबाइल पर हर प्रकार के डाटा का आदान प्रदान इंटरनेट पर हो रहा है। तो ऐसे मे यह जरूरी हो जाता है की जो लोग इंटरनेट का उपयोग कर रहे हैं उनकी सुरक्षा (Security) पर भी ध्यान दिया जाये की साइबर सुरक्षा व बचाव कैसे किए जाये । तो यहाँ बात आती है साइबर सुरक्षा यानि की Cyber Security in Hindiकी।

तो आज हम विस्तार से जानेगे Cyber Security के वारे मे- की कैसे दिन प्रतिदिन इंटरनेट पर Fraud, Hacking और Data Leak की लगातार कोशिश की जा रही है। ऐसे मे Cyber Security द्वारा ही इन सभी गतबिधियों पर नज़र रखी जाती है। जिससे इंटरनेट पर होने वाले साइबर Attack को रोका जा सके।

मेमोरी [Memory]:

कंप्यूटर मेमोरी यूनिट्स (Computer Memory Units)

What is Cyber Security ? [साइबर सिक्योरिटी क्या है ?]

साइबर सिक्योरिटी ( Cyber Security in Hindi) दो शब्दों से मिल कर बना है , “साइबर” और “सिक्योरिटी” साइबर” का मतलब है – इंटरनेट पर उपस्थित सभी प्रकार की Information या कहें सूचनाए जिनका उपयोग हम कम्प्युटर या मोबाइल मे करते हैं उन सभी को साइबर मे सम्मलित करते हैं।

और “सिक्योरिटी” का मतलब होता है ,”सुरक्षा” या कहें हानि से बचाव करने की क्रिया या व्यवस्था। हम सामान्य भाषा में कह सकते हैं कि साइबर सिक्योरिटी का मतलब है इंटरनेट (साइबर) पर किसी भी तरह के खतरों से बचने के लिए किये गए उपाय या कहें आपकी किसी भी गोपनीय या निजी सूचनाओं को किसी भी तरह के खतरों से बचने के लिए किये गए उपाय। इन सभी को सम्मिलित रूप से साइबर सिक्योरिटी कहा गया है।

साइबर सुरक्षा क्यों महत्वपूर्ण है? [Why is cyber security important? in Hindi]

आज हमलोग कम्प्युटर या मोबाइल पर इंटरनेट के माध्यम कुछ छोटी बड़ी बुनियादी सुबीधाओं पर निर्भर हो गए हैं। जैसे बिजली के बिल को हम इंटरनेट के माध्यम से भरने लगे हैं, बैंक मे भी कई सारे transaction हम इंटरनेट के माध्यम से करते है। कई आवश्यक e- mail हम मोबाइल और कम्प्युटर से इंटरनेट के माध्यम भेजते है इसके अलावा Social Platform, जैसे फेस्बूक और whatsaap पर भी कई सारे अपने फॅमिली और निजी फोटो को भेजते हैं। और भी बहुत से डाटा का आदान प्रदान हम इंटरनेट के माध्यम से करते ही रहते हैं।

तो इसलिए Cyber खतरों से बचने के लिए Cyber Security हमारे लिए और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

Cyber security services in Hindi [ साइबर सिक्योरिटी सर्विसेज ]

कई कंपनियां साइबर सुरक्षा सेवाओं की पेशकश करेंगी जो विभिन्न प्रकार के उपकरणों का उपयोग करके आपकी जानकारी की निगरानी और सुरक्षा करने में मदद करती हैं। घुसपैठ की एक बहुत कुछ सरल से उपजी है। इसके कुछ उदाहरण सॉफ़्टवेयर को अपडेट करना, एक भाला फ़िशिंग ईमेल खोलना या गलती से मैलवेयर इंस्टॉल करना भूल रहे हैं। मैलवेयर जैसे वायरस असली वायरस की तरह होते हैं। आप उन्हें उनके शुरुआती चरणों में पकड़ना चाहते हैं। साइबर सुरक्षा सेवाएँ आपके डेटा की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए विशेष रूप से लागू कई सुरक्षा प्रोटोकॉल, परीक्षण और दिनचर्या को मिलाकर इस प्रक्रिया को सरल बनाने का प्रयास करती हैं।

साइबर के खतरे फेलने के प्रकार [Type of cyber threats, in Hindi]

Internet पर Cyber Security को खतरा कई प्रकार से हो सकता है –

Ransom ware (रैनसमवेयर)

जैसा की नाम से ही पता चलता है हमारे computer में ransom ware एक बार इनस्टॉल होने के बाद हमारे सारे डाटा को एन्क्रिप्ट कर दिया जाता है यानी उसे लॉक कर दिया जाता है या यूँ कहें किडनैप कर दिया जाता है और उसी अनलॉक या डिक्रिप्ट करने के लिए हमसे पैसे मांगे जाते हैं बिलकुल वैसे ही जैसे किसी को किडनैप करने के बाद उसे छुड़ाने के बदले फीरोती या ransom मांगी जाती है। Ransomware के ज्यादातर भुगतान Bitcoin या crypto currency के द्वारा ही होते हैं जिससे ransomware के developer को या ransomware भेजने वाले को पकड़ा ना जा सके।

Malware क्या है?

Malware एक तरह का कंप्यूटर सॉफ्टवेयर ही होता है जिसे हम Malicious Software भी कहते हैा यह एक तरह का दूषित सॉफ्टवेयर होता है जिसका एक ही मकसद होता है लोगो के कंप्यूटर को नुक्सान पहुचाना. malware को बनाया ही इसी मकसद के साथ जाता है की यह हमारे या किसी स्पेसिफिक यूजर के कंप्यूटर को नुक्सान पहुचाये इसके और भी कई मकसद हो सकते हैं जैसे आपका डाटा चुराना, आपका पासवर्ड चुराना, या आपके कंप्यूटर के डाटा को मिटाना यानी डिलीट कर देना. Malicious Software अपने आप नहीं बनते इनको किसी डेवलपर या हैकर द्वारा ही बनाया जाता है, जिससे वो हमारे कंप्यूटर को हानि पंहुचा सके।
Malicious Software आपके कंप्यूटर में कई तरीको से आ सकते हैं जैसे या तो आप खुद ही उन्हें गलती से डाउनलोड कर ले या किसी स्पैम ईमेल के जरिये या किसी वेबसाइट के जरिये. क्यूंकि ऐसी कई वेबसाइट हैं जिन पर malicious सॉफ्टवेयर की लिंक उपलब्ध है और एक ही दिन में लोगों को ढेरों स्पैम ईमेल आते हैं इनमे से कितने ही लोग malware डाउनलोड भी कर लेते हैं और इनका शिकार हो जाते है।

Spyware (स्पाईवेयर)

Spyware का काम होता है आपके द्वारा अपने कंप्यूटर में की गयी सभी एक्टिविटीज और डाटा पर नज़र रखना और उन्हें किसी और के पास भेजना होता है बिलकुल एक जासूस की तरह यह किसी भी अनजान सॉफ्टवेयर के साथ bind हो कर इनस्टॉल हो सकते हैं क्यूंकि ये बहुत ही छोटे होते है। Spyware को किसी ख़ास व्यक्ति, जगह या किसी ख़ास कंप्यूटर को टारगेट करके बनाया जाता है और इसका काम सिर्फ आपके डाटा पर नज़र रखना होता है।

Adware (ऐडवेयर)

Adware का ख़ास मकसद आपके device या डाटा को हानि पहुचाना नहीं होता बल्कि इसके इनस्टॉल होने के बाद आपको बिना किसी app को ओपन किये ही होम स्क्रीन पर ही advertise दिखने लगते हैं यह अक्सर स्मार्टफोन में देखने को मिलता है यह तरह तरह की टेढ़ी मेढ़ी वेबसाइट से कुछ भी डाउनलोड करने की बजह से होता है।

इन साइबर हमलों से हम बचें कैसे?

अगर कोई व्यक्ती मोबाइल या कम्प्युटर पर इंटरनेट का स्तेमाल करता है तब उसे बहुत ही सचेत रहना पड़ेगा, इन साइबर हमलों से बचने के लिए। तो अब हम आपको आगे Cyber Security in Hindi के लिए कुछ सुझाव बता रहे हैं, अगर इन सुझाबो का आप पालन करते हैं, तब आप अपने कीमती Data का या कहे Information को या पैसे को Loss होने से बचा सकते है।

  • तो सबसे पहला सुझाव, आप अपने मोबाइल या कम्प्युटर के ऑपरेटिंग सिस्टम को हमेसा समय समय पर Update करते रहें। जिससे आपके इन devices को और ज्यादा साइबर हमलों से सुरक्षा मिलेगी।
  • अपने कम्प्युटर और मोबाइल या टैब मे एक अच्छे कंपनी का Anti-Virus Software को खरीद कर Install करें। और अगर पहले से ये सॉफ्टवेर आपके कम्प्युटर या मोबाइल मे है तो समय समय पर इनको अपडेट भी करते रहें। जिससे अगर कोई नया वाइरस या malware आपके कम्प्युटर या मोबाइल पर हमला करता है तो इनकी पहचान करके इन्हे वही पर रोका जा सके।
  • आप ईमेल का स्तेमाल करते है। या किसी बैंक की वैबसाइट पर जाकर कोई ट्रैंज़ैक्शन करते हैं, तब वहाँ पर आप Password का उपयोग जरूर करेंगे। तो यहा पर हमारा सुझाब है की आप जो भी पासवर्ड डालें वह बहुत ही मजबूत होना चाहिए। यानि आसानी से पहचानने वाला पासवर्ड नहीं होना चाहिए।
  • ईमेल अटैचमेंट को ठीक से देखकर ही खोलें और अनजान व्यक्ति द्वारा भेजे गए ईमेल अटैचमेंट्स को तो बिलकुल भी ना खोलें। डाउनलोड करने के बाद उन्हें ठीक से किसी antimalware software से स्कैन कर लें।
  • पायरेटेड चीज़ें जैसे फ़िल्में या पेड सॉफ्टवेयर फ्री में डाउनलोड करने के चक्कर में विलकुल भी ना पड़ें यह गलत है और इसकी बजह से आपको और आपके कीमती डाटा को भी खतरा हो सकता हैं।
  • कहीं पर भी आपको फ्री के WI FI के चक्कर मे नहीं पड़ना चाहिए। नहीं तो ये फ्री वाले WIFI, आपके कीमती डाटा को चुरा कर इसका गलत स्तेमाल कर सकते हैं।

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Computer Viruses

‘Computer Viruses’ Full Information- कंप्यूटर वायरस की सम्पूर्ण जानकारी

आज के इस लेख में हम जानेंगे Computer Viruses के बारे में. कंप्यूटर वायरस आज के समय मे ऐसी समस्या बन गई है उन लोगों के लिए जो कंप्यूटर, लैपटॉप, मोबाइल और टैबलेट इत्यादि का उपयोग करते हैं। तो आज हम इस में यह जानेंगे कि यह वायरस होते क्या है? और यह कितने प्रकार के होते हैं? और हमारे लिए क्या क्या समस्‍याऐ पैदा करते हैं? तो Virus को समझने से पहले हम समझते हैं Malware के बारे में.

Malware क्या है?

Malware एक तरह का कंप्यूटर सॉफ्टवेयर ही होता है जिसे हम Malicious Software भी कहते हैा यह एक तरह का दूषित सॉफ्टवेयर होता है जिसका एक ही मकसद होता है लोगो के कंप्यूटर को नुक्सान पहुचाना. malware को बनाया ही इसी मकसद के साथ जाता है की यह हमारे या किसी स्पेसिफिक यूजर के कंप्यूटर को नुक्सान पहुचाये इसके और भी कई मकसद हो सकते हैं जैसे आपका डाटा चुराना, आपका पासवर्ड चुराना, या आपके कंप्यूटर के डाटा को मिटाना यानी डिलीट कर देना. Malicious Software अपने आप नहीं बनते इनको किसी डेवलपर या हैकर द्वारा ही बनाया जाता है, जिससे वो हमारे कंप्यूटर को हानि पंहुचा सके।

Malicious Software आपके कंप्यूटर में कई तरीको से आ सकते हैं जैसे या तो आप खुद ही उन्हें गलती से डाउनलोड कर ले या किसी स्पैम ईमेल के जरिये या किसी वेबसाइट के जरिये. क्यूंकि ऐसी कई वेबसाइट हैं जिन पर malicious सॉफ्टवेयर की लिंक उपलब्ध है और एक ही दिन में लोगों को ढेरों स्पैम ईमेल आते हैं इनमे से कितने ही लोग malware डाउनलोड भी कर लेते हैं और इनका शिकार हो जाते है।

Malware के प्रकार | Types of Malicious software

Malicious software के कई प्रकार भी होते हैं जो अलग-अलग तरह से काम करते हैं या यूँ कहे की हमारे कंप्यूटर और डाटा को नुकशान पहुचाते है इनके काम करने का तरीका अलग-अलग होता है Malware के कुछ टाइप्स इस प्रकार है।

Virus (वायरस)

What is Computer Viruses ?

अब वायरस होता क्या है ? वायरस एक ऐसे प्रोग्राम होते हैं या सॉफ्टवेयर होते हैं जो हमारे कंप्यूटर, लैब टॉप, मोबाइल व टैब मैं पड़े हुए प्रोग्राम को खराब करते हैं, उन में पड़ी हुई फाइल्स को इंफेक्टेड करते हैं। वह फाइल जो हमारे लिए बहुत ही इंपॉर्टेंट होती हैं जैसे डॉक्यूमेंट फाइल इमेज फाइल्स या वीडियो फाइल्स और भी बहुत सारी ऐसी फाइल्स जो हमारे लिए बहुत ही ज्यादा इंपोर्टेंट होती हैं उन फाइलों को इंफेक्टेड करती है। वायरस मनुष्य में जिस तरह से बीमारी फैलाते हैं जैसे TV का वायरस जुकाम का वायरस और भी कई अन्य तरह के वायरस से होने वाली बीमारी हम लोगों को लगती है उस तरह के लिविंग वायरस नहीं होते कंप्यूटर या लैपटॉप में जो वायरस होता है वह एक प्रोग्राम होता है जिसका नाम वायरस रख दिया गया है जो कि हमारे फाइल्स को खराब करता है।

तो यह वायरस नाम रखा था 1983 में अमेरिका के एक साइंटिस्ट ने जिनका नाम था, फ्रेड्रिक बी. कोहन, इन्होंने सबसे पहले इस तरह के सॉफ्टवेयर का नाम वायरस रखा। जिसका fulform है – Vital Information Resource Under Siege.

Creepar नामक वायरस पहला ऐसा वायरस था जो ARPANET में 1970 में नेटवर्क पर फैला था। जैसे आज इंटरनेट पर कई तरह के viruses फैले हुए हैं, उसी तरह से पहले US Defence Military के लिए एक नेटवर्क बनाया गया था जिसका नाम था ARPANET Station, उसी में ये नेटवर्क वायरस फैला हुआ था।

PC में फैलने वाला सबसे पहला वायरस ELK Cloner था जो 1982 में फैला था। जिसे एक 15 वर्षिय रिचर्ड स्क्रेंटा ने ऐप्पल II (Dos 3.3) ऑपरेटिंग सिस्टम के लिए यह वायरस बनाया था, जो फ्लॉपी डिस्केट्स पर Store रहता था। जब कंप्यूटर को एल्क क्लोनर से संक्रमित फ्लॉपी डिस्क से बूट किया जाता तो वायरस उस PC को Infected कर देता है। और हमारा कंप्यूटर खराब हो जाता है।

Worms (वोर्म्स)

Worms काफी हद तक कंप्यूटर वायरस (Computer Viruses) की तरह ही होतें है लेकिन इसकी ख़ास बात यह है की यह अपने आप की ही कई कॉपी बना सकता है यानी यह फैलता जाता है और आपके नेटवर्क से जुड़े सारे या किसी भी कंप्यूटर में जाकर उसे भी इन्फेक्टेड कर सकता है इसे फैलने के लिए किसी निर्देश की जरूरत नहीं पड़ती यह आपके कंप्यूटर में ईमेल, इन्टरनेट सर्फिंग, downloading के समय आ सकता है यह वायरस की तरह ही आपके डाटा को नुकशान पहुचाता है या उसे क्रेश कर देता है।

Trojan horse (ट्रोजन हॉर्स) Computer Viruses

Trojan horse की शुरुआत अभी से बल्कि बहुत ही प्राचीन काल में हुई थी जब ग्रीक के लोगो ने टर्की के एक शहर ट्रॉय पर हमला करने के लिए एक बड़ा लकड़ी का घोडा बनाया था जिसमे कई सेनिक छिप कर टर्की के अंदर गए थे और रात होते ही उन्होंने टर्की पर हमला कर दिया था इसी बड़े लकड़ी के घोड़े को Trojan horse दिया गया था। इसी तरह से कंप्यूटर के अंदर भी Trojan horse (Computer Viruses) होते हैं जो install होने के बाद हमारे कंप्यूटर पर नियंत्रण पा लेता है। बसिकली ट्रोजन हॉर्स कंप्यूटर पर नियंत्रण पाने के बाद वायरस और दुसरे malware से हमले करवाता है जिससे हमारा डाटा corrupt हो जाता है।

Ransomware (रैनसमवेयर)

Ransom ware जैसा की नाम से ही पता चलता है हमारे computer में ransom ware एक बार इनस्टॉल होने के बाद हमारे सारे डाटा को एन्क्रिप्ट कर दिया जाता है यानी उसे लॉक कर दिया जाता है या यूँ कहें किडनैप कर दिया जाता है और उसी अनलॉक या डिक्रिप्ट करने के लिए हमसे पैसे मांगे जाते हैं बिलकुल वैसे ही जैसे किसी को किडनैप करने के बाद उसे छुड़ाने के बदले फीरोती या ransom मांगी जाती है। Ransomware के ज्यादातर भुगतान Bitcoin या crypto currency के द्वारा ही होते हैं जिससे ransomware के developer को या ransomware भेजने वाले को पकड़ा ना जा सके।

Spyware (स्पाईवेयर)

Spyware का काम होता है आपके द्वारा अपने कंप्यूटर में की गयी सभी एक्टिविटीज और डाटा पर नज़र रखना और उन्हें किसी और के पास भेजना होता है बिलकुल एक जासूस की तरह यह किसी भी अनजान सॉफ्टवेयर के साथ bind हो कर इनस्टॉल हो सकते हैं क्यूंकि ये बहुत ही छोटे होते है। Spyware को किसी ख़ास व्यक्ति, जगह या किसी ख़ास कंप्यूटर को टारगेट करके बनाया जाता है और इसका काम सिर्फ आपके डाटा पर नज़र रखना होता है।

Adware (ऐडवेयर)

Adware का ख़ास मकसद आपके device या डाटा को हानि पहुचाना नहीं होता बल्कि इसके इनस्टॉल होने के बाद आपको बिना किसी app को ओपन किये ही होम स्क्रीन पर ही advertise दिखने लगते हैं यह अक्सर स्मार्टफोन में देखने को मिलता है यह तरह तरह की टेढ़ी मेढ़ी वेबसाइट से कुछ भी डाउनलोड करने की बजह से होता है।

Malware से बचने के उपाय

दोस्तों आपको malware (Computer Viruses) से बचने के लिए बस कुछ छोटी-छोटी बात का ही ध्यान रखना होता है लेकिन कभी-कभी यह बात हमें पता नहीं होती जिनकी बजह से हमें बहुत सारी समस्याए देखने या झेलने को मिलती हैं तो आइये जानते हैं इन छोटी छोटी बातों के बारे में।

सबसे पहली बात हमेशा कुछ भी डाउनलोड करने से पहले अच्छे से चेक कर लें की वेबसाइट ओरिजिनल है या कोई फेक वेबसाइट है अगर वेबसाइट इतनी पोपुलर नहीं है तो आप उस वेबसाइट पर कमेंट पड़कर पता लगा सकतें है की वह कैसी है अगर आपको उसमे कमेंट सेक्शन नहीं मिलता है तो वहां से डाउनलोड बिलकुल ना करें।

ईमेल अटैचमेंट को ठीक से देखकर ही खोलें और डाउनलोड करने के बाद उन्हें ठीक से किसी antimalware software से स्कैन कर लें।

अगर आपके कंप्यूटर पर कोई नज़र रख सकता है या उसमे कुछ जरूरी डाटा रखा हुआ है तो untrusted या अनजान व्यक्ति द्वारा भेजे गए ईमेल अटैचमेंट्स बिलकुल ना खोलें।

सॉफ्टवेयर डाउनलोड करते समय सॉफ्टवेयर की ऑफिसियल वेबसाइट या trusted और जानी मानी वेबसाइट का ही उपयोग करें।

पायरेटेड चीज़ें जैसे फ़िल्में या पेड सॉफ्टवेयर फ्री में डाउनलोड करने के चक्कर में ना पड़ें यह गलत है और इसकी बजह से आप को और आपके कीमती डाटा को खतरे भी हो सकते हैं।

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Traffic Challan Online

How to check & Pay traffic challan online (ट्रेफिक चालान को ऑनलाइन कैसे चेक करें व चालान को ऑनलाइन कैसे भरें)?

आज के लेख का टॉपिक है की “How to Pay and check traffic challan online”

जैसा कि हम सभी लोग जानते हैं ! नए मोटर व्हीकल नियम (new motor whechal rule 2019) के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन करता है ! तो अब उसे भारत सरकार को 10 गुना ज्यादा फाइन भरना होगा ! जैसा कि हम सभी लोग देख रहे हैं , कि जो पहले 500 रुपये का चालन कटता था ! आज वह 5000 रु. चालान कट रहा है ! हाल ही मे बनाए गए इन नियमों का भारत में काफी विरोध भी हो रहा है ! लेकिन भारत सरकार ने भी इस चालान प्रक्रिया को सरल करते हुये यानि आपकी परेशानियों को ध्यान में रखते हुए इस चालान भरने की प्रक्रिया को ऑनलाइन किया है ! यदि आपका चालान कट जाता है ! तो आप इस चालान को ऑनलाइन भी चेक कर सकते हैं ! तथा ऐसे चालान का आप ऑनलाइन भुगतान भी कर सकते हैं !

अब चालान करने का तरीका भी काफी एडवांस हो गया है। अब अगर आप शहर मे ट्रेफिक नियमो के बिरुद्ध गाड़ी चलाते है तो चलती गाड़ी का कैमरे के माध्यम से भी चालान हो जाता है ! और आपको पता भी नहीं चलता है !

तो अगर आप रोड पर चल रहे हैं , और आप से कोई गलतीnहो जाती है ! तो आप घर आकर एक बार अपने गाड़ी का चालान जरूर चेक करें ! कहीं आपका ऑनलाइन चालान तो नहीं काट दिया गया है ! यदि काट दिया गया है , तो आप उसे ऑनलाइन भुगतान कर सकते हैं ! नहीं तो आपको भारी भरकम जुर्माना भरना पड़ सकता है या फिर जैल भी हो सकती है।

ट्रेफिक चालान को कैसे चेक करें ? अगर चालान कट गया है तो ऑनलाइन कैसे जमा करें?

ऑनलाइन चालान चेक (check traffic challan online ) करने के लिए सबसे पहले आपको इस दिए गए वेबसाइट पर जाना होगा ,यदि आप ऑनलाइन चालान जमा ((pay traffic challan online))करना चाहते हैं , तब भी आपको इसी वेबसाइट पर जाना होगा । उसके बाद आपके सामने इस तरह की विंडो खुलेगी, जिस पर आप अपना चालान नंबर ,गाड़ी नंबर, या डीइल नंबर डालकर चेक कर सकते हैं ।

इन तीन में से आपको एक चीज डालकर गेट डिटेल पर क्लिक करेंगे . यदि आपका चालान कटा होगा ,तो आपको इस तरह की विंडो दिखाई देगी जहां पर आपका चालान किसलिए काटा गया है , कितना काटा गया है , संपूर्ण जानकारी लिखी मिलेगी !

How to pay traffic challan online

विंडो पर आपको ऑनलाइन चालान जमा (submit traffic challan online)करने का ऑप्शन भी मिलेगा इसके माध्यम से आप ऑनलाइन अपना जुर्माना भर सकते हैं. जैसे ही आप ऑनलाइन चालान भरते हैं तो आपको एक slip दी जाती है जिसे आप प्रिंट करके रख सकते हैं , और समय आने पर उसे किसी भी अधिकारी को दिखा सकते हैं.

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Driving License

ड्राइविंग लाइसेंस कैसे बनवाएँ (Driving License kaise banwayen)?

अगर आप टू व्‍हीलर और फोर व्‍हीलर चलाते हैं तो आपके पास ड्राइविंग लाइसेंस का होना अनिवार्य है।
आज के दौर मे ड्राइविंग Licence एक आवश्यक डॉकयुमेंट हो गया है। जिसके द्वारा न सिर्फ हम वाहन चलाने के लिए Eligible होते है, बल्कि इसे हम ID Proof के रूप मे भी स्तेमाल करते हैं।
तो आज हम आपको बाताएंगे की ये

ड्राइविंग Licence क्या होता है?
और इसको बनवाने की क्या प्रक्रिया होती है ?

ड्राइविंग Licence, भारत सरकार द्वारा जारी किया गया एक एसा दस्तावेज़ है जिससे किसी भी वाहन चालक को सार्वजनिक सड़क पर वाहन चलाने की permission मिलती है ।
बैसे आज के समय मे हम ऑनलाइन भी ड्राइविंग Licence बनवा सकते हैं। कई लोग सोचते हैं की बिना एजेंट की मदद से हम ड्राइविंग Licence नहीं बनवा सकते है । यदि हमे इसकी सही प्रक्रिया मालूम हो तो हम बिना किसी एजेंट की सहायता से ड्राइविंग Licence आसानी से बनवा सकते हैं।
- Permanent ड्राइविंग Licence बनवाने से पहले हमे एक Learning ड्राइविंग Licence बनवाना पड़ता है।

Learning ड्राइविंग Licence के लिए आवश्यक डॉक्युमेंट्स

Learning ड्राइविंग Licence कोई भी बनवा सकता है जिसकी उम्र 18 वर्ष से अधिक है, लेकिन उस व्यक्ती के पास निम्नलिखित डॉक्युमेंट्स का होना आवश्यक है।
आयु प्रमाणपत्र (Age Certificate), कोई भी एक -
1 जन्म प्रमाणपत्र
2 पैन कार्ड
3 पासपोर्ट
4 School की Marksheet (जिसमे जन्म तिथि लिखी हो)
Address Proof इनमे से कोई भी एक -
Voter ID Card
आधार कार्ड
राशन कार्ड
पासपोर्ट
लाइट बिल

Online learning Driving Licence बनाने की प्रक्रिया

Online learning Driving Licence बनवाने के लिए, आपके पास उपरोक्त डॉकयुमेंट स्कैन किए हुए होने चाहिये, साथ ही आपके पास पासपोर्ट सीजे के फोटो व यदि आप 40 वर्ष से अधिक आयु के है तो आपको मेडिकल सर्टिफिकेट की भी आवश्यकता होगी। यदि आपके पास यह सभी डॉकयुमेंट स्कैन किए हुए है तो आप Online learning Driving Licence आसानी से बनवा सकते हैं।

Online Driving Licence बनवाने के Steps :

सबसे पहले सड़क परिवहन मंडल की वेबसाइट पर sarathi.parivahan.gov.in/…/stateSelection.doजाएँ। आप इस वेबसाइट से ड्राइविंग लाइसेंस संबधी सभी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

ड्राइविंग लाइसेंस बनाने की सभी जानकारी इस वेबसाइट पर मौजूद है। अब आपको लर्निंग लाइसेंस बनवाना है या स्थाई ड्राइविंग लाइसेंस (Permanent Driving Licence ) बनवाना है यह डिसाइड करना है। यदि आपके पास पहले से ही लर्निंग लाइसेंस है तो आप स्थाई ड्राइविंग लाइसेंस भी इस वेबसाइट से बनवा सकते है। अगर नहीं है तो सबसे पहले आपको लर्निंग ड्राइविंग लाइसेंस ही बनवाना पडेगा।

ऑनलाइन से लर्निंग ड्राइविंग लाइसेंस कैसे Apply करें ( How to Apply Online Learning Licence)?

Follow Steps:

Step-1

सबसे पहले आपको यहां पर दिए गए वेबसाइट पर क्लिक करना होगा|

आपसे पूछा जाएगा की आप किस स्टेट का लाइसेंस बन बनवाना चाहते हैं उस state को सेलेक्ट कीजिए|
अब आपके सामने ऑप्शन आएगा अप्लाई ऑनलाइन | अब अप्लाई ऑनलाइन लिंक पर क्लिक कर के न्यू ड्राइविंग लाइसेंस लिंक पर क्लिक करें

अब ऑनलाइन आवेदन फॉर्म खुल जाएगा जहाँ पर आपको मांगी गई सारी जानकारी सही से भरनी होगी
आवेदन के लिए फीस भी आप ऑनलाइन ही जमा कर सकते हैं
आवेदन सम्पूर्ण होने पर आवेदन संख्या नोट कर के रख लें
ऑनलाइन आवेदन संपन्न होने पर क्या करें
इसके बाद शुरु होगा आपको फिजिकल ड्राइविंग टेस्‍ट।
यानि अब आपको टू व्‍हीलर, फोर व्‍हीलर या जिस व्‍हीकल डीएल के लिए आपने एप्‍लाई किया है,
वो वाहन आपको संबंधित अधिकारी के सामने सही ढंग से चलाकर दिखाना होगा।
इस फिजिकल ड्राइविंग टेस्‍ट के लिए आपको अपना वाहन साथ लेकर जाना होगा।
ये ड्राइविंग टेस्‍ट पास करने के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि टेस्‍ट देते समय कभी भी अपनी ड्राइविंग को लेकर ओवर कॉन्‍फीडेंट न बनें।
साथ ही सामने खड़े अधिकारी के निर्देशों को मानते हुए सभी ट्रैफिक रूल्‍स फालो करते हुए गाड़ी चलाएं।
जब सम्बंधित मोटर व्हीकल इंस्पेक्टर आपको ड्राइविंग लाइसेंस टेस्ट में पास घोषित कर देगा उसके बाद आपके आवेदन को पूर्ण रूप से स्वीकृति मिल जायेगी और कुछ ही दिनों में ड्राइविंग लाइसेंस प्राप्त किया जा सकता है

Driving License के खोने पर आपको क्या करना चाहिए?

यदि आपका Driving License खो गया है तो घबराने की कोई जरुरत नहीं है क्यूंकि आप इसके बदले में दूसरा इसका duplicate apply कर सकते हैं. इसके लिए आपको कुछ निर्देशों का पालन करना पड़ेगा.

सबसे पहले नजदीकी Police Station में जाएँ जहाँ आपका Driving License खो गया है.
वहां एक Complaint दर्ज करें और ये निस्चित करें के आपके पास उस complain (FIR) की एक copy होनी चाहिए ताकि आप बाद में उसका इस्तमाल कर सकें.
अपने शहर के Notary office में जाएँ और एक affidavit stamped paper में तैयार करें. इसके लिय आपको थोडा charges पड़ सकता है. वह affidavit एक proof के तरह काम करेगा जिसमें ये mention रहेगा की वाकई आपका Driving License खो गया है|
यह affidavit अब डुप्लीकेट लाइसेंस फॉर्म के संलग्न कर के जमा कर दें।

Internet

इंटरनेट क्या है | इंटरनेट के लिए आवश्यक उपकरण (Equipment’s required for Internet)

Internet Equipment’s

  • पीसी (PC-Personal Computer)
  • माॅडेम (Modem)
  • संचार माध्यम – टेलीफोन लाइन या
  • वायरलेस तकनीक
  • इंटरनेट साफ्टवेयर (वेब ब्राउसर)
  • इंटरनेट सर्विस प्रदाता (ISP=Internet Service Provider)

Internet User को निर्धारित शुल्क देकर इंटरनेट खाता, यूजर नेम तथा पासवर्ड प्राप्त किया जाता है। User Name Internet से जुड़ने के लिए तथा Password, Securiry (सुरक्षा) और गोपनीयता के लिएआवश्यक है।

वेब ब्राउसर (Web Browser):

यह एक Application Software है जो वल्र्ड वाइड वेब (www) से सूचना तथा डाटा प्राप्त करने तथा उसे उपयोगकर्ता (Internet Equipment’s) के कम्प्यूटर पर प्रदर्षित करने का कार्य करता है। इसे वेब सर्च इंजन (web search engine) भी कहा जाता है। यह सर्फिंग करते समय उपयोगकर्ता को सूचना प्राप्त करने में सहायता करता है तथा समय की बचत भी करता है। यह पूर्व में प्रयोग किए गए इंटरनेट साइट का विवरण रखता है तथा डाटा को डाउनलोड करने की सुविधा भी प्रदान करता है।
वल्र्ड वाइड वेब से सूचना प्राप्त करने के लिए वेब ब्राउसर परUniform Resource Identifier (जैसे- Google.com) डाला जाता है।
कुछ प्रचलित वेब ब्राउसर हैं- .

  • Internet Explorer
  • Netscape Navigator
  • Mozilla Firefox
  • Apple’s Safari
  • Google Chrome
  • Avant

Opera मोबाइल फोन में प्रचलित

वेब सर्वर (Web Server):

वह कम्प्यूटर जो वेब पेज को भंडारित करता है तथा नेटवर्क से जुड़े अन्य कम्प्यूटरों के अनुरोध पर उन्हें वेब पेज उपलब्ध कराता है, वेब सर्वर कहलाता है।

माॅडेम (Modem):

यह Modulator-De-Modulator का संक्षिप्त रूप है। कम्प्यूटर डिजिटल संकेत उत्पन्न करता है जबकि संचार माध्यम पर केवल एनालाॅग संकेत भेजा जा सकता है। माॅडेम वह युक्ति है जो कम्प्यूटर के डिजिटल संकेतों (Digital Signals) को एनालाॅग संकेत में बदलकर संचार माध्यम पर भेजता है तथा आने वाले एनालाॅग संकेतों को डिजिटल संकेतों में बदलकर कम्प्यूटर के प्रयोग के योग्य बनाता है।

माॅडेम के प्रकार (Types of Modem):

बाहृ संरचना के आधार पर माॅडेम दो प्रकार के होते हैं-
(a) आंतरिक माॅडेम (Internal Modem): इसे सिस्टम यूनिट के अंदर स्थापित किया जाता है।
(b) बाहृ माॅडेम (External Modem): इसे सिस्टम यूनिट के बाहर रखा जाता है।

Internet- Types of Modem
Types of Modem

डोमेन नेम सिस्टम (Domain Name System)

यह नेटवर्क पर कम्प्यूटर, सर्वर या वेबसाइट के निष्चित नामकरण की प्रणाली है ताकि उसे अलग पहचान दी जा सके। यह सामान्य भाषा में दिए गए नाम को अंकीय पता (IP Address) में बदलता है तथा उससे संपर्क स्थापित करता है।
उदाहरण के लिए, यदि हम इंटरनेट पर ूूूij www.example.com लिखते हैं तो कम्प्यूटर इसे अंकीय पता 192.0.32.10 में बदलकर इस वेबसोइट को खोजता है। इस प्रकार, यह अंकीय पता की जगह याद रखने योग्य आसान पता का प्रयोग संभव बनाता है।

डोमेन नेम (Domain Name)

नेटवर्क में प्रत्येक कम्प्यूटर को एक विशेष नाम दिया जाता है जिसे डोमेन नेम कहते हैं। डोमेन नेम के दो भाग होते हैं-
(a) नाम (Name)
(b) एक्सटेंशन (Extension Name)
यहां नाम कुछ भी रखा जा सकता है, पर एक्सटेंषन उपलब्ध विकल्पों में से ही कोई एक हो सकता है। जैसे-Example.com में example नाम है जबकि .com एक्सटेंशन है।

  • डोमेन नेम में अंक या अक्षर या दोनों हो सकते हैं।
  • इसमें अधिकतम 64 कैरेक्टर हो सकते है।
  • इसमें एकमात्र विशेष कैरेक्टर प्रयोग किया जा सकता है।
    कुछ प्रमुख डोमेन नेम इस प्रकार है
  • .com – Communication (नेटवर्क प्रदाता)
  • .net – Network
  • .gov – Government सरकारी संस्था
  • .edu – Educationशेक्षिक संस्था
  • .org – Organisation स्वैच्छिक संस्थान
  • .mil – Military सैनिक
  • .int – International अंतर्राष्ट्रीय
  • .in – India भारत
  • .us – United State

यूनीफार्म रिसोर्स लोकेटर (Uniform Resource Locator)

यह कम्प्यूटर नेटवर्क की व्यवस्था है जो बताता है कि वांछित सूचना कहां उपलब्ध है और उसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है। वल्र्ड वाइड वेब पर किसी वेब पेज का एड्रेसURL का उदाहरण है।
URL में शामिल होता है-

  • Protocol का नाम
  • Colon तथा दो ://(Slash)
  • Host Name (IP Address)
  • Domain Name

जैसे –http://www.google.com

ट्रांसमिशन कंट्रोल प्रोटोकाल/इंटरनेट प्रोटोकाल (TCP/IP)

इन दोनों सम्मिलित रूप से इंटरनेट प्रोटोकाल सूट (Internet Protocol Suite) कहा जाता है।
ट्रांसमिशन कंट्रोल प्रोटोकाल (Transmission Control Protocol ) का प्रयोग कर इंटरनेट पर दूरस्थ कम्प्यूटर के बीच संचार स्थापित किया जाता है। टीसीपी डाटा को पैकेट्स में विभाजित कर उन्हें भेजे जाने का रास्ता तय करता है। यह प्राप्त किए गए पैकेट्स को पुनः व्यवस्थित कर डाटा में परिवर्तित भी करता है। वल्र्ड वाइड वेब, ईमेल, फाइल ट्रांसफर आदि इसके कुछ व्यवहारिक उपयोग है।

इंटरनेट प्रोटोकाल (Internet Protocol) इंटरनेट पर संचार व्यवस्था सुनिश्चित करता है। इंटरनेट से जुड़े प्रत्येक कम्प्यूटर को एक विशेष अंकीय पता (Numerical Address) दिया जाता है जिसे आईपी एड्रेस (IP Address) कहा जाता है।
वर्तमान में Internet Protocol Version 6 (IPv6) का उपयोग किया जा रहा है जो 128 बिट एड्रेस का प्रयोग करता है।

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